✍️ मनमोहन भट्ट, डुंडा/उत्तरकाशी।
पहाड़ों की पारंपरिक तकनीक, ग्रामीण नवाचार और सतत आजीविका मॉडल को जानने–समझने के उद्देश्य से आईआईटी रूड़की के डिज़ाइनिंग विभाग के 20 छात्र एवं पीएचडी स्कॉलर्स शनिवार को उत्तरकाशी जनपद के डुण्डा क्षेत्र पहुंचे। यह दल चार दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण पर है, जहां वे घराट (परंपरागत जलचक्की), ग्रामीण पर्यटन, स्थानीय खेती और पहाड़ी जीवन शैली का व्यवहारिक अध्ययन करेंगे।
घराट श्रृंखला के संस्थापक एवं अध्यक्ष विजयेश्वर प्रसाद डंगवाल ने बताया कि डुण्डा ब्लॉक के विभिन्न गांवों में यह दल स्थानीय आजीविका तंत्र, जलधारा आधारित ऊर्जा प्रणाली और परंपरागत कृषिगत विधियों को समझेगा। अध्ययन यात्रा का मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभवों से सीखकर पहाड़ों के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन को किन स्थानीय मॉडलों के माध्यम से मजबूत किया जा सकता है।
डंगवाल ने कहा कि पहाड़ों में आजीविका और प्रकृति संरक्षण दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। “हमारे पूर्वजों ने कभी प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन नहीं किया। अब समय है कि हम फिर से उन्हीं सतत् जीवन मूल्यों की ओर लौटें,” उन्होंने कहा अरण्य गंगा अस्तल, डुण्डा में आयोजित इस शैक्षणिक कार्यक्रम में छात्रों को पारंपरिक घराट तकनीक, जल-ऊर्जा के उपयोग, स्थानीय फसली चक्र, ग्रामीण पर्यटन मॉडल और सामुदायिक नवाचारों से रुबरु कराया जाएगा। भ्रमण के बाद छात्र एक समग्र प्रस्ताव तैयार करेंगे, जो पहाड़ों के संतुलित व सतत विकास के लिए उपयोगी सिफ़ारिशों का आधार बनेगा।
कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता देवेश कोठारी ने पहाड़ों में जल-संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बारिश का अधिकांश जल बिना रुके मैदानी क्षेत्रों में बह जाता है, जिससे भूजल पुनर्भरण प्रभावित होता है। उन्होंने चाल, खाल, खन्ती जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियाँ पुनर्जीवित करने पर जोर दिया। राज्य सरकार से पुरस्कृत जानकी देवी ने पारंपरिक ऊनी वस्त्रों की कताई और रंगाई की तकनीक छात्रों को सिखाई।
इस अवसर पर पीएचडी स्कॉलर गजेन्द्र, सामाजिक कार्यकर्ता देवेश कोठारी, दिनेश भट्ट, पिंकी, चिराग, अनिल डंगवाल, नंदनी तथा मास्टर ऑफ डिज़ाइनिंग के सभी 20 छात्र-छात्राओं ने सक्रिय रूप से भागीदारी की।




