शिक्षा विभाग में 2364 पदों की आउटसोर्सिंग पर सवाल, विवादित कंपनी को जिम्मेदारी क्यों?
देहरादून: उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में 2364 चतुर्थ श्रेणी पद—परिचारक, स्वच्छक और सह-चौकीदार—को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरने का फैसला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। दस्तावेजों के अनुसार इन पदों की जिम्मेदारी मास मैनेजमेंट कंपनी को सौंपी गई है, जो पहले भी विवादों में रह चुकी है।
पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप
सूत्रों के अनुसार एम्स ऋषिकेश में आउटसोर्सिंग प्रक्रिया के दौरान इसी कंपनी पर बेरोजगार युवाओं से नौकरी दिलाने के नाम पर धन उगाही के आरोप लगे थे। उस समय प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे और पारदर्शी भर्ती की मांग जोर पकड़ गई थी।
अब वही कंपनी शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में हजारों पदों की भर्ती प्रक्रिया संभालेगी—यहीं से सवाल खड़े होने लगे हैं।
बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं
क्या टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी?
क्या कंपनी का पिछला रिकॉर्ड जांचा गया?
क्या युवाओं से किसी प्रकार की फीस या अप्रत्यक्ष वसूली पर रोक के लिए ठोस प्रावधान हैं?
यदि पहले शिकायतें थीं, तो ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया गया?
संवेदनशील विभाग, बड़ी जिम्मेदारी
शिक्षा विभाग सीधे स्कूलों और विद्यार्थियों से जुड़ा है। ऐसे में परिचारक और सह-चौकीदार जैसे पदों की भर्ती में किसी भी प्रकार की अनियमितता न केवल युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ होगी, बल्कि स्कूलों की व्यवस्था पर भी असर डालेगी।
अब निगाहें सरकार और विभागीय अधिकारियों पर हैं—क्या वे इस पूरे मामले में पारदर्शिता बरतेंगे या फिर हजारों बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों पर सवालिया निशान लगा रहेगा?
यदि आपके पास भी इस भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी कोई जानकारी या शिकायत है, तो उसे सार्वजनिक करना जरूरी है—क्योंकि सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।

