अंकिता हत्याकांड: सीबीआई जाँच पर सवाल, टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस सार्वजनिक करने की माँग
सीबीआई जाँच भी बन सकती है दिखावा, बिना टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस VIP बचेगा
पेपर लीक के बाद अब अंकिता मामला: सीबीआई जाँच की पारदर्शिता पर उठे सवाल
देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड में उत्तराखंड सरकार द्वारा सीबीआई जाँच की संस्तुति किए जाने के बाद भी जाँच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष समिति के सदस्य मोहित डिमरी ने सरकार से सीबीआई जाँच के टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस (ToR) सार्वजनिक करने की माँग करते हुए कहा कि बिना स्पष्ट दायरे के की जा रही जाँच “आँखों में धूल झोंकने” जैसी साबित हो सकती है।
मोहित डिमरी ने कहा कि जनदबाव के चलते सरकार ने सीबीआई जाँच की घोषणा तो कर दी, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जाँच किन बिंदुओं तक सीमित रहेगी और किन लोगों को इसके दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह जाँच सिर्फ पहले से जेल में बंद तीन आरोपियों तक सीमित रहेगी या फिर उन लोगों तक पहुँचेगी जिनके नाम लेने से सत्ता और प्रशासन के गलियारों में असहजता होती है।
उन्होंने कहा कि यह पहला मामला नहीं है जब सीबीआई जाँच की घोषणा हुई हो। कुछ समय पहले बेरोज़गारों के पेपर लीक मामले में भी सीबीआई जाँच की घोषणा की गई थी, लेकिन आज तक यह स्पष्ट नहीं है कि वह जाँच कहाँ तक पहुँची, किस स्तर तक गई और उसका निष्कर्ष क्या रहा। उस मामले में भी सरकार ने टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस सार्वजनिक नहीं किए, जिसके कारण पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए और बेरोज़गार आज भी जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सीबीआई कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक जाँच एजेंसी है जो अपने टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस के अनुसार काम करती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस ही तय करते हैं कि जाँच सच तक पहुँचेगी या फिर किसी तय सीमा पर रोक दी जाएगी। जाँच कहाँ तक जाएगी, किन दरवाज़ों तक पहुँचेगी और किन नामों पर रुक जाएगी, यह सब पहले से तय किए गए दायरे पर निर्भर करता है।
उन्होंने आशंका जताई कि अंकिता भंडारी मामले में सबसे बड़ा खतरा यही है कि सरकार ने सीबीआई जाँच की घोषणा तो कर दी है, लेकिन न तो टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस सार्वजनिक किए गए हैं, न ही जाँच का दायरा स्पष्ट किया गया है और न ही VIP की भूमिका पर कोई स्थिति साफ़ की गई है। ऐसे में जाँच की निष्पक्षता पर भरोसा करना कठिन है।
उन्होंने ने सवाल उठाया कि क्या रिज़ॉर्ट को तोड़ने का आदेश देने वालों की जाँच होगी, क्या सबूत मिटाने के फैसले की जिम्मेदारी तय की जाएगी और क्या उन अधिकारियों की भूमिका की जाँच होगी जिन्होंने शुरुआती स्तर पर मामले को कमजोर किया। उन्होंने कहा कि यदि ये बिंदु टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस में शामिल नहीं हैं, तो यह जाँच भी एसआईटी जाँच की तरह सीमित रह जाएगी और प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश की जाएगी।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यापम घोटाला और कोयला घोटाले जैसे मामलों में भी सीबीआई जाँच हुई, लेकिन सीमित टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस के कारण राजनीतिक संरक्षण की परतें पूरी तरह उजागर नहीं हो सकीं और बड़े जिम्मेदार लोग जाँच के दायरे से बाहर रह गए।
मोहित डिमरी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य सीबीआई पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सिस्टम की कमज़ोरियों को उजागर करना है। उन्होंने कहा कि कमजोर टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस सबसे मजबूत जाँच एजेंसी को भी निष्प्रभावी बना सकते हैं।
उन्होंने सरकार से मांग की कि यह लिखित रूप में स्पष्ट किया जाए कि क्या VIP की भूमिका जाँच का हिस्सा होगी, क्या सबूत मिटाने और रिज़ॉर्ट तोड़ने के निर्णयों की जाँच होगी, क्या शुरुआती पुलिस जाँच की गड़बड़ियों और राजनीतिक दबाव की पड़ताल की जाएगी। साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि सीबीआई जाँच को सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में कराया जाए, ताकि जाँच पर किसी भी तरह के दबाव की गुंजाइश न रहे।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि सरकार सच में निष्पक्ष है, तो उसे टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस सार्वजनिक करने, जाँच का पूरा दायरा स्पष्ट करने और न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करने से डरना नहीं चाहिए। जब तक यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि सीबीआई जाँच कहाँ तक और किन-किन तक जाएगी, तब तक अंकिता को न्याय दिलाने का संघर्ष जारी रहेगा।




