दून पुलिस
सत्ता के हाकिमों से एक सवाल, “साहिब कैसे रुके अपराध?
20 लाख की सुरक्षा को केवल एक हज़ार !”
देहरादून के अखबार हर सुबह अपराध की वारदातों से सने होते है और कलम वाले भैया और बहन जी रोज़ पुलिस प्रणाली पर आरोप लगाते हुए एक प्रश्न चिह्न छोड़ देते है। यह प्रश्न चिन्ह जनता की पुलिस के प्रति नकारात्मक सोच को और बल देता है और बिना सोचे जनता पुलिस को गरियाने लगती है और ऐसा माहौल बना दिया जाता है मानो पुलिस ने ही वो अपराध किया हो।
उत्तराखंड एक बहुत छोटा राज्य है जिसकी कुल पंजीकृत आबादी बमुश्किल 1 करोड़ 50 लाख भी नही पहुंची होगी, 2011 के जनसंख्या सर्वेक्षण में 1 करोड़ 21 लाख थी। चार मैदानी क्षेत्रफल वाले जिलों को छोड़ दे तो बाकी 9 जिलों में अपराध का ग्राफ काफी नीचे रहता है जिस कारण भारत के सभी राज्यों में उत्तराखंड वो दूसरा राज्य है जहां सबसे कम अपराध होता है।
प्रदेश की राजधानी होने के कारण देहरादून विशेष रूप से कलम की रडार पर रहता है क्योंकि सत्ता का केंद्र बिंदु यही है। राजधानी बनने के उपरांत देहरादून में अपराध खूब बढ़ा और संगठित अपराध ने भी अपनी जड़ें यहां मजबूत की। कभी देहरादून जिला जेल जाएंगे तो पाएंगे कि वहां बन्द 60% से भी अधिक अपराधी गैर राज्यों के है जिन्हें देहरादून ने पनाह दी।
अपराध होने के बाद हा-हुल्ला मचना लाज़मी है। राज्य सरकार के अधीन होने के कारण यह हा-हुल्ला अक्सर राजनैतिक रंग भी लेता है और विपक्ष सरकार को घेरने के लिए सॉफ्ट टारगेट पुलिस को चुनता है और सत्ता के हाकिम विपक्ष का मुहँ बन्द करने के लिए किसी कर्तव्यनिष्ट पुलिसकर्मी की बलि चढ़ा देते है। कोई नही जो प्रश्न उठाये कि आखिर अपराध रुके तो रुके कैसे??
26 जुलाई 2018 को लोकसभा में ग्रह मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट पटल पर पेश की गई जिसके अनुसार भारत मे प्रत्येक 547 भारतीयों पर एक पुलिसकर्मी तैनात है जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार 454 नागरिकों पर एक पुलिस कर्मी होना चाहिए। अमेरिका में यह आंकड़ा 436, स्पेन में 198 और दक्षिण अफ्रीका में 347 है। 50 देशों की ‘बदहाल पुलिस’ सूची में भारत दूसरे पायदान पर केवल यूगांडा से पीछे है। अब आप समझ सकते है कि खाकी किस बदहाली में है।
भारत मे 90% पुलिसकर्मी 8 घण्टे से अधिक काम करते है,जिनमें से 68% दिन में 12 घण्टे से अधिक और 28% 14 घंटों से भी अधिक दिन में काम करते है। बदले में मिलती है समाज की गाली और प्रताड़ना जिस कारण 70% से भी अधिक पुलिसकर्मी अपनी सेवाकाल में ही किसी ना किसी बीमारी की चपेट में आ जाते है।
देहरादून जिले में कुल 22 थाने है जिनमें बमुश्किल 1000 पुलिसकर्मी तैनात है। देहरादून जिले की आबादी अब 20 लाख के पार हो चुकि है अर्थार्थ हर 2000 नागरिकों के लिए केवल एक पुलिसकर्मी! इन 1000 पुलिसकर्मियों में से भी लगभग 30% नेताओं-अधिकारियों और विशेष सेवा जैसे कि कावड़, कुम्भ, चार धाम यात्रा में तैनात है। अब आप समझ सकते होंगे कि बचे हुए ये 700 पुलिसकर्मी किस प्रकार ड्यूटी कर पाते होंगे। ऐसी विकट परिस्तिथियों में भी यह कर्तव्यनिष्ट खाकीधारी डटकर अपराध से जूझ रहे है। गत 2 वर्षों में देहरादून पुलिस ने उत्कृष्ठ मानक स्थापित किये है। 2-4 मामलों को छोड़ दे तो हर अपराध सुलझा है और हर अपराधी आज सलाखों के पीछे है। परंतु एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि conviction rate निरंतर गिरावट पर है अर्थार्थ पुलिस अक्सर अपराधी को कोर्ट में दोषी सिद्ध करने में असफल रहती है। निश्चित ही इस पहलू को नकारा नही जा सकता कि कहीं ना कहीं अपराध की विवेचना में कोई ना कोई कसर छूट जाती है जिस कारण अपराधी दोष मुक्त हो रहे है परंतु यदि एक विवेचक (अधिकांश मामलों में विवेचक निरीक्षक या दरोगा होता है) की दिनचर्या पर नज़र डालें तो कारण स्पष्ठ हो जाएगा। 24 घण्टे की ड्यूटी में बमुश्किल 6 घंटे की नींद किसी दरोगा को नसीब होती होगी, कोई बड़ी घटना हो तो कई दिन तक घर का अता-पता नही रहता। उसके बाद ट्रैफिक ड्यूटी, धरने-प्रदर्शन में ड्यूटी, विवेचना हो तो हो कैसे?? चारों तरफ से जनता और नेताओं का दबाव। आखिर पुलिस वाला भी इंसान ही है हनुमान नही।
सत्ता के नशे में चूर इन हाकिमों से विनती है कि पुलिस रिफॉर्म्स पर ध्यान दे। जनता और मीडिया से आग्रह है कि अगली बार किसी पुलिसकर्मी को गाली देने से पहले यह लेख अवश्य पढ़ले।
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