6200 करोड़ रुपये लागत से, रिस्पना और बिंदाल नदियों के ऊपर 26 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड कॉरिडोर:
हिमांशु नौरियाल
*ब्यूरो प्रमुख,उत्तराखंड
देहरादून, उत्तराखंड:
देहरादून में रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में ट्रैफिक की तस्वीर पूरी तरह बदल सकता है। करीब 6200 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह 26 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर रिस्पना और बिंदाल नदियों के ऊपर बनाया जाएगा। इसके पूरा होने के बाद हरिद्वार बाईपास (कारगी) से मसूरी रोड (मालसी) तक सफर बेहद तेज और आसान हो जाएगा।
इस प्रोजेक्ट को भविष्य की परियोजनाओं को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया है, जो 2051 तक के ट्रैफिक लोड को भी संभालेगी। एलिवेटिड रोड को सिंगल पिलर पर बनाया जाएगा और इसे बाढ़ जैसी परिस्थितियों से सुरक्षित रखने के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट का मकसद शहर के पुराने ट्रैफिक जाम से राहत दिलाना है। 26 किलोमीटर का हाई-स्पीड कॉरिडोर रिस्पना और बिंदल नदियों पर बनाने का प्लान है, जो शहर के दक्षिणी हिस्से को मसूरी के पास उत्तरी तलहटी से जोड़ेगा।
यह प्रोजेक्ट कंस्ट्रक्शन के लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को सौंपा गया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद क्लॉक टॉवर, राजपुर रोड और ISBT जैसे शहर के बड़े हॉटस्पॉट पर ट्रैफिक कम करना है। इससे मसूरी तक पहुंच भी बेहतर होगी और यह दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के लिए एक कनेक्टर का काम करेगा।
जब यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा तो निसंदेह घंटाघर, राजपुर रोड, बल्लूपुर, ISBT जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाम कम होगा
और हरिद्वार और दिल्ली जाने वालों का सफर आसान होगा जिससे व्यापार और टूरिज्म को मिलेगा बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
पर मेरा मानना है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह गलियारा यातायात को कम करेगा, लेकिन यह भीड़भाड़ को बढ़ा सकता है और हजारों निवासियों को विस्थापित कर सकता है और शहर की पर्यावरणीय स्थिरता और बाढ़ प्रतिरोधक क्षमता को खतरे में डाल सकता है। देहरादून एक भूकंपीय रूप से नाजुक क्षेत्र है, और इसके जलमार्गों पर निर्माण करने से आपदा का खतरा बढ़ जाता है इसके अलावा, इस कॉरिडोर से मसूरी में ट्रैफिक बढ़ने की उम्मीद है, जो एक लोकप्रिय हिल स्टेशन है और जिसकी वाहनों की वहन क्षमता पहले ही पार हो चुकी है।
लेकिन मुझे डर है कि पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि नदी के तल में खंभे लगाने से प्राकृतिक जल निकासी बाधित होगी, भूजल पुनर्भरण कम होगा, और बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे नदी के किनारे के लगभग 2,500 से 3,000 घरों को विस्थापित होना पड़ सकता है।
मुझे यह भी लगता है कि यह सड़क परियोजना 2018 के व्यापक गतिशीलता योजना का एक महंगा और अस्थिर विकल्प है, जिसने उत्सर्जन को कम करने और जलवायु लचीलापन बढ़ाने के लिए स्थायी परिवहन समाधान प्रस्तावित किए थे।
मेरी समझ में देहरादून को एक स्थायी विकास समाधान की आवश्यकता है, न कि इसके लिए एक तदर्थ, अनियोजित दृष्टिकोण की। मुझे लगता है कि यह परियोजना सड़क यातायात की भीड़ को हल करने के बजाय मसूरी डायवर्जन जैसे अंतिम कोनों और बिंदुओं तक ही स्थानांतरित कर देगी। इसलिए, धन को स्थायी समाधानों पर अधिक केंद्रित किया जाना चाहिए, जैसे सार्वजनिक परिवहन में सुधार और मौजूदा सड़कों का उन्नयन।
अतः सरकार को भविष्य में विस्थापित होने वाले लोगों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के साथ बैठक करके एक कमेटी बनानी चाहिए जो कि हाल एक पहलू को गहनता से जांचे और तड़पश्चत एक “मध्य- मार्गीय” उपाय निकाले। इसमें कोई संदेह नहीं है कि धामी सरकार की नीयत बिल्कुल साफ है किंतु चूंकि ” हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, इसलिए दोनों पहलुओं को भली भांति जांच परख करने के पश्चात ही कोई निर्णय लेना चाहिए जो सब वर्गों के लिए हितकारी साबित हो। यही ” चाणक्य-नीति” भी होती है।

