उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भालू और गुलदार के हमले अब अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हकीकत बनते जा रहे हैं। जनपद उत्तरकाशी की तहसील डुंडा अंतर्गत ग्राम सभा जुणगा की ताज़ा घटना ने एक बार फिर वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आज दिनांक 9 फरवरी 2026, सुबह करीब 10 बजे, ग्राम सभा जुणगा निवासी मुकेश भंडारी अपने घर के आसपास झाड़ियाँ काट रहे थे। तभी झाड़ियों में पहले से छुपे भालू ने अचानक हमला कर दिया। हमले में मुकेश भंडारी गंभीर रूप से घायल हो गए। स्थानीय ग्रामीणों के शोर–शराबे और तत्परता से उनकी जान तो बच गई, लेकिन घटना ने पूरे गांव में दहशत फैला दी है।
हमले बढ़े, लेकिन वन विभाग मौन
चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। उत्तरकाशी ही नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी उत्तराखंड में भालू और गुलदार के हमले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन वन विभाग की भूमिका केवल घटनाओं के बाद औपचारिक बयान देने तक सीमित रह गई है।
ना तो संवेदनशील इलाकों में नियमित गश्त है,
ना ही ट्रैप कैमरे, पिंजरे या चेतावनी तंत्र प्रभावी ढंग से लगाए जा रहे हैं।
गांव–गांव में डर, जंगल अब घरों तक
वन्यजीवों का गांवों और घरों के आसपास आ जाना इस बात का संकेत है कि
जंगलों में अव्यवस्थित कटान,
जंगलों में भोजन की कमी,
और वन विभाग की नाकामी
ने हालात को बेकाबू बना दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार सूचना देने के बावजूद वन विभाग घंटों बाद पहुंचता है या केवल खानापूर्ति कर लौट जाता है। न मुआवज़े की प्रक्रिया आसान है और न ही सुरक्षा के ठोस इंतज़ाम।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
आखिर कब तक पहाड़ों के लोग अपनी जान जोखिम में डालकर जंगलों के बीच जीवन जीते रहेंगे?
क्या किसी बड़ी जनहानि के बाद ही वन विभाग जागेगा?
क्या वन्यजीव प्रबंधन केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है?
तत्काल कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि
जुणगा और आसपास के क्षेत्रों को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया जाए,
भालू की तत्काल निगरानी और रेस्क्यू टीम तैनात की जाए,
और घायल को उचित मुआवज़ा व बेहतर इलाज सुनिश्चित किया जाए।
जब तक वन विभाग ज़मीनी स्तर पर ईमानदार और सक्रिय भूमिका नहीं निभाएगा, तब तक पहाड़ों में इंसान और वन्यजीवों का यह खतरनाक टकराव यूँ ही चलता रहेगा — और हर बार कीमत आम ग्रामीण

