सुशासन” और पुलिस-प्रशासन की चुस्ती पर सवाल, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला


जय भारत टीवी के वरिष्ठ पत्रकार हेम भट्ट पर हुआ कायराना हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी पत्रकारिता, लोकतंत्र और संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। यह घटना उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर शासन–प्रशासन के दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस प्रदेश में सरकार “सुशासन” और पुलिस-प्रशासन की चुस्ती का दावा करती है, वहां दिन-दहाड़े एक वरिष्ठ पत्रकार पर हमला कैसे हो जाता है?
क्या अपराधियों को यह भरोसा हो चुका है कि न तो पुलिस समय पर कार्रवाई करेगी और न ही शासन सख्ती दिखाएगा?
हेम भट्ट की कलम ने जिन सच्चाइयों को उजागर किया, वही सच्चाइयां शायद सत्ता और व्यवस्था में बैठे कुछ लोगों को चुभ रही थीं। तभी तो सवाल पूछने वाले पत्रकार को सुरक्षा देने के बजाय डराने की कोशिश की गई।
शासन–प्रशासन से सीधे सवाल—
क्या उत्तराखंड में सच बोलना अब अपराध बन चुका है?
प्रदेश में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो गए कि वे खुलेआम एक पत्रकार को निशाना बना रहे हैं?
क्या “सुशासन” का दावा करने वाली सरकार पत्रकारों को सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है?
शासन और प्रशासन की चुप्पी क्या अपराधियों को मौन संरक्षण नहीं दे रही?
यदि इस मामले को लीपापोती की भेंट चढ़ाया गया, तो यह साफ संदेश जाएगा कि उत्तराखंड में सच लिखने और बोलने वालों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है।
दोषियों की तत्काल पहचान, गिरफ्तारी, और हमले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
हम हेम भट्ट के साथ खड़े हैं।
यह लड़ाई किसी एक पत्रकार की नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सच की है।
याद रखिए—
आप कलम तोड़ सकते हैं,
लेकिन सच की गूंज को दबा नहीं सकते




