“मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ऐसे लोगों को खोना समाज के लिए नुकसान है” — दीप्ति दुधपुरी
कोटद्वार। मूलनिवास-भू-कानून समिति की बैठक के दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जिनसे मिलकर मैं बेहद प्रभावित हुई। यह व्यक्ति हैं आशुतोष नेगी, जिनकी भूमिका को अंकिता भंडारी बहन के मामले में न्याय की आवाज को मजबूती से उठाने वालों में महत्वपूर्ण बताया जाता है।
उस दौर को याद करते हुए लगता है कि यदि कुछ लोग मजबूती से आवाज नहीं उठाते, तो शायद यह मामला भी उन अनगिनत बेटियों की तरह दबकर रह जाता, जिनके परिवार आज भी न्याय की उम्मीद में संघर्ष कर रहे हैं।
व्यक्तिगत रूप से भी मैं आशुतोष नेगी को लंबे समय से जानती हूं। मैंने हमेशा देखा है कि किसी बहन या किसी भी व्यक्ति की परेशानी हो, वे एक बड़े भाई की तरह उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं। जरूरत के समय लोगों के लिए ढाल बनकर खड़ा होना और दूसरों की लड़ाई को अपनी लड़ाई समझकर आवाज उठाना उनकी पहचान रही है।
दीप्ति दुधपुरी का कहना है कि जो व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए खड़ा होता है, ऐसे लोगों की समाज को जरूरत होती है। ऐसे लोग केवल किसी राजनीतिक संगठन की संपत्ति नहीं होते, बल्कि संघर्ष कर रहे लोगों और बहनों के लिए उम्मीद और भरोसे का सहारा बनते हैं।
ऐसे में आशुतोष नेगी के निष्कासन के मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व से पुनर्विचार और गंभीर विचार-विमर्श की अपील की गई है। उनका कहना है कि राजनीतिक दलों के भीतर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को संगठन से अलग करने से पहले उसके सामाजिक योगदान, जनहित में उठाई गई आवाज और लोगों के बीच उसकी भूमिका के हर पहलू पर विचार किया जाना चाहिए।
“मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ऐसे समर्पित और जनहित में खड़े रहने वाले व्यक्ति को अलग करने से पहले पार्टी नेतृत्व को हर पहलू पर विचार करना चाहिए।”
— दीप्ति दुधपुरी
कार्यकारी जिलाध्यक्ष, पौड़ी गढ़वाल
जय देवभूमि! जय उत्तराखंड!




