✍️ मनमोहन भट्ट,डुंडा/उत्तरकाशी।
उत्तराखंड में एक ओर सरकार हरेला पर्व के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और “एक पेड़ माँ के नाम” जैसे अभियानों को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर उत्तरकाशी जनपद के डुंडा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत नवागांव से सामने आई तस्वीरें इन दावों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
यहां हरेला पर्व पर वितरण के लिए लाए गए फलदार पौधे सड़क किनारे बिखरे पड़े मिले। जिन पौधों ने फलों के साथ साथ लोगों के आंगन और खेतों में हरियाली लानी थी, वे सड़क पर सूखते हुए अपनी अंतिम सांसें गिनते दिखाई दे रहे हैं। सड़क पर यूँ लावारिस पड़े पौधे न केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के संदेश को भी कमजोर करते हैं।
स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन पौधों को हरेला पर्व के दिन वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा सड़क किनारे फेंक दिया गया। वन विभाग ने केवल पौधों की बर्बादी नहीं की बल्कि सरकारी धन, पर्यावरण संरक्षण और हरेला जैसे पवित्र लोकपर्व का भी खुला अपमान किया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन पौधों को सड़क पर क्यों छोड़ा गया? क्या वितरण की कोई योजना नहीं थी? क्या सिर्फ कागजों में लक्ष्य पूरे करने के लिए पौधे मंगाए गए थे? क्या हरेला सिर्फ फोटो खिंचवाने और सरकारी आंकड़े बढ़ाने तक सीमित रह गया है? क्या पौधों का वितरण केवल कागजों में ही दिखाना रह गया? आखिर जिन पौधों पर सरकारी धन खर्च हुआ,उन्हें इस तरह सड़क पर मरने के लिए किसने छोड़ दिया? यदि पौधे लोगों तक पहुंचने ही नहीं थे, तो सरकारी धन क्यों खर्च किया गया?
अब जिम्मेदारी तय होना बेहद जरूरी है। सड़क पर बिखरे हुए पौधे जांच का विषय है और यदि जांच में लापरवाही सामने आती है,तो दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि नष्ट हुए पौधों और सरकारी धन की भरपाई कौन करेगा।
हरेला केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, प्रकृति और भविष्य से जुड़ा लोकपर्व है। ऐसे में यदि इसकी आड़ में लापरवाही हुई है, तो यह पूरे अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
यदि समय रहते इन पौधों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो यह घटना हरेला अभियान की गंभीर विफलता का प्रतीक बन जाएगी।




