जीबीपीआईईटी और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के बीच एमओयू
भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत गोविंद बल्लभ पंत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (जीबीपीआईईटी), पौड़ी गढ़वाल और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर, देवप्रयाग के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। जीबीपीआईईटी की ओर से संस्थान के निदेशक प्रो. (डॉ.) विजय कुमार बंगा तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से परिसर निदेशक प्रो. पी.वी.बी. सुब्रह्मण्यम ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के तहत दोनों संस्थान भारतीय ज्ञान प्रणाली, आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति एवं पारंपरिक विरासत से जुड़े विषयों पर संयुक्त अनुसंधान, पाठ्यक्रम विकास, शैक्षणिक कार्यक्रम, संकाय विकास कार्यक्रम, प्रशिक्षण कार्यशालाएं, संगोष्ठियां एवं सम्मेलन आयोजित करेंगे। विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के अकादमिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया जाएगा।
जीबीपीआईईटी के निदेशक प्रो. (डॉ.) विजय कुमार बंगा ने कहा कि यह समझौता भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इससे विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अंतर्संबंधों पर अध्ययन एवं अनुसंधान के नए अवसर मिलेंगे। साथ ही उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत को अकादमिक गतिविधियों से जोड़ने में भी यह सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों की संयुक्त समन्वय समिति गठित की जाएगी। भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठ, उत्कृष्टता केंद्र अथवा अन्य संस्थागत व्यवस्थाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण की संभावनाओं पर भी कार्य किया जाएगा। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा पाठ्यक्रम विकास, कार्यक्रम निर्माण एवं अनुसंधान के क्षेत्र में जीबीपीआईईटी को अकादमिक एवं परामर्शात्मक सहयोग प्रदान किया जा सकता है। यह समझौता पांच वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा।
समारोह के दौरान श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के विद्वानों एवं विद्यार्थियों द्वारा स्वस्तिवाचन किया गया, जिससे कार्यक्रम का वातावरण आध्यात्मिक एवं गरिमामय बन गया।
यह समझौता भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक तकनीकी शिक्षा एवं उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के बीच अकादमिक एवं अनुसंधानात्मक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे शिक्षा, अनुसंधान, क्षमता निर्माण एवं नवाचार के क्षेत्र में नए अवसर विकसित होने की उम्मीद है।




