✍️ मनमोहन भट्ट, डुंडा /उत्तरकाशी।
उत्तराखंड सरकार हर वर्ष लोकपर्व हरेला के अवसर पर लाखों पौधों का वितरण करती है। इस अभियान का उद्देश्य केवल पौधे बांटना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाना, अधिक से अधिक वृक्षारोपण को बढ़ावा देना और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली सुनिश्चित करना है। सरकार इस अभियान पर लाखों रुपये खर्च करती है ताकि प्रत्येक पौधा धरती पर लगकर एक दिन वृक्ष बने और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प को मजबूत करे।
लेकिन उत्तरकाशी जनपद के डुंडा विकासखंड की ग्राम पंचायत नवागांव में हरेला पर्व के दिन सड़क किनारे बड़ी संख्या में पौधे फेंके जाने का मामला अब भी रहस्य बना हुआ है। घटना को आज 11 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर इन पौधों को किसने और क्यों सड़क पर फेंका। जिस दिन पूरे प्रदेश में हरेला पर्व पर पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा था, उसी दिन सड़क किनारे पड़े इन पौधों की तस्वीरों ने पूरे अभियान पर सवाल खड़े कर दिए।
खबर प्रकाशित होने के बाद वन विभाग ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच की और स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि इन पौधों को वन विभाग के किसी कर्मचारी द्वारा फेंका गया था। विभाग ने साफ कहा है कि इस घटना में वन विभाग की कोई भूमिका नहीं है।
वन विभाग के इस स्पष्टीकरण के बाद मामला और भी गंभीर हो गया है। यदि वन विभाग जिम्मेदार नहीं है, तो फिर आखिर इन पौधों को सड़क पर किसने फेंका? ये पौधे किस विभाग, संस्था या व्यक्ति की जिम्मेदारी में थे? इन्हें लोगों तक पहुंचाने के बजाय सड़क पर क्यों छोड़ दिया गया?
वहीं ग्राम पंचायत नवागांव की ग्राम प्रधान लक्ष्मी देवी ने भी स्पष्ट किया है कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ये पौधे किस विभाग के द्वारा यहां लाया गया और इन्हें कब तथा किसके द्वारा सड़क किनारे फेंका गया। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक दोषियों की पहचान करने और उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को बढ़ावा न मिले।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि घटना को 11 दिन बीत जाने के बावजूद पौधे सड़क किनारे पड़े रहे और अब तक किसी जिम्मेदार विभाग या अधिकारी ने उन्हें हटाने या बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की। यदि समय रहते इन पौधों का रोपण कर दिया जाता, तो इनमें से कई पौधे आज धरती की हरियाली बढ़ा रहे होते। यह केवल पौधों की बर्बादी नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य की भी अनदेखी है।
अब सबसे बड़ा सवाल प्रशासन और संबंधित विभागों से है—यदि वन विभाग जिम्मेदार नहीं है, तो जिम्मेदार कौन है? आखिर इन पौधों को सड़क पर किसने फेंका? क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक दोषियों को सामने लाया जाएगा? क्या सरकारी योजनाओं और संसाधनों के साथ लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी?
सबसे अहम सवाल यह भी है कि इन पौधों की भरपाई कौन करेगा? सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से तैयार किए गए इन पौधों के नष्ट होने से हुए नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या दोषियों से इसकी भरपाई कराई जाएगी, या फिर सरकारी धन और पर्यावरण दोनों की इस क्षति को यूं ही भुला दिया जाएगा?
अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कर सच्चाई जनता के सामने लाए। क्योंकि सवाल केवल कुछ पौधों का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की जवाबदेही, पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीरता और जनता के विश्वास का भी है। जब तक वास्तविक दोषियों की पहचान कर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक हरेला पर्व पर सड़क पर फेंके गए ये पौधे व्यवस्था पर सवाल उठाते रहेंगे।




