✍️ मनमोहन भट्ट, डुंडा/उत्तरकाशी।
हरेला पर्व के दौरान सड़क किनारे पड़े मिले पौधों को लेकर प्रसारित समाचार का वन विभाग ने गंभीरता से संज्ञान लिया। विभागीय अधिकारियों द्वारा पूरे प्रकरण की जांच कराई गई।
जांच के दौरान संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों से पूछताछ के साथ-साथ मौके की स्थिति का भी परीक्षण किया गया। जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि सड़क किनारे वास्तव में फलदार पौधे फेंके गए। जिन्हें वन विभाग ने सुरक्षित स्थान पर रख दिया है लेकिन इन पौधों को वन विभाग के किसी भी कर्मचारी द्वारा नहीं फेंका गया था। विभागीय स्तर पर कर्मचारियों की किसी प्रकार की लापरवाही अथवा संलिप्तता के साक्ष्य भी नहीं मिले।
वन विभाग ने स्पष्ट किया कि हरेला अभियान के अंतर्गत पौधों का वितरण एवं पौधारोपण नियमानुसार किया गया था तथा विभागीय जांच में कर्मचारियों पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं हुई।
हालांकि, इस जांच के बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—यदि वन विभाग के कर्मचारियों ने पौधे नहीं फेंके, तो आखिर इन्हें सड़क किनारे किसने छोड़ा? यह पहलू अभी भी जांच का विषय बना हुआ है। सरकारी संपत्ति और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस मामले में वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति या व्यक्तियों की पहचान होना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
वन विभाग की जांच ने कर्मचारियों को आरोपों से अलग अवश्य किया है, लेकिन पौधों के सड़क किनारे पहुंचने की वास्तविक परिस्थितियों का खुलासा होना अभी बाकी है। इसलिए मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच कर वास्तविक दोषियों की पहचान करते हुए उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई किया जाना आवश्यक है।
वन विभाग के स्पष्टीकरण एवं जांच रिपोर्ट के आलोक में यह स्पष्ट किया जाता है कि पूर्व में प्रसारित समाचार में व्यक्त की गई आशंकाओं की विभागीय जांच से पुष्टि नहीं हुई। तथ्यों को सामने लाना पत्रकारिता का दायित्व है, इसलिए जांच के निष्कर्षों के आधार पर यह संशोधित एवं स्पष्टीकरण स्वरूप समाचार प्रकाशित/प्रसारित किया जा रहा है।




