✍️ मनमोहन भट्ट, देहरादून।
उत्तराखंड पुलिस के 4600 ग्रेड-पे का मुद्दा एक बार फिर प्रदेश की राजनीति, शासन और पुलिस परिवारों के बीच बड़ा विषय बन गया है। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा के बाद शुरू हुआ यह मामला अब न्यायालय, शासन और पुलिस मुख्यालय से होते हुए आंदोलन के निर्णायक दौर में पहुंच गया है। 4600 ग्रेड-पे के साथ-साथ 8 घंटे की ड्यूटी, कार्य परिस्थितियों और लंबित मांगों को लेकर भी पुलिस परिवारों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
2021 की घोषणा, लेकिन स्थायी समाधान नहीं👇
21 अक्टूबर 2021 को पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पुलिस कर्मियों को 4600 ग्रेड-पे देने की घोषणा की थी। पुलिस परिवारों ने इसे वर्षों पुरानी मांग के समाधान की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना। हालांकि बाद में जारी शासनादेश में स्थायी ग्रेड-पे लागू करने के बजाय केवल पात्र कर्मियों को एकमुश्त आर्थिक लाभ देने का प्रावधान किया गया, जिसके बाद विवाद शुरू हो गया।आंदोलनकारियों का कहना है कि शासनादेश मुख्यमंत्री की मूल घोषणा की भावना के अनुरूप नहीं था।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इंतजार👇
प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं निकलने पर मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर निर्धारित समय में निर्णय लेने के निर्देश दिए थे।
27 अक्टूबर 2025 से शुरू हुई छह माह की समय-सीमा 27 अप्रैल 2026 को समाप्त हो चुकी है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि आज तक इस मामले में स्पष्ट स्पीकिंग ऑर्डर जारी नहीं किया गया, जिससे पुलिस परिवारों में भारी नाराजगी है।
विवाद केवल वेतन का नहीं👇
पुलिस कर्मियों का कहना है कि यह केवल वेतन बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई घोषणा को लागू कराने का प्रश्न है। वहीं सरकार का पक्ष यह रहा है कि सेवा नियमों, पदोन्नति व्यवस्था और वर्तमान कैडर संरचना के अनुसार ही निर्णय लिया जा सकता है।
ASI कैडर और बढ़ा विवाद👇
पुलिसकर्मियों का तर्क है कि मुख्यमंत्री की घोषणा उस समय हुई थी जब वर्तमान ASI कैडर व्यवस्था लागू नहीं थी। इसलिए बाद में हुए प्रशासनिक बदलावों के आधार पर घोषणा की मूल भावना को बदला नहीं जाना चाहिए।
8 घंटे ड्यूटी की मांग भी तेज👇
4600 ग्रेड-पे के साथ पुलिस कर्मियों की दूसरी बड़ी मांग 8 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था है। उनका कहना है कि कई बार उन्हें लगातार 12 से 16 घंटे या उससे अधिक समय तक ड्यूटी करनी पड़ती है। चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, चुनाव, वीआईपी ड्यूटी, कानून-व्यवस्था और आपदा जैसी परिस्थितियों में कार्यभार और बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक कार्य अवधि का असर पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन और कार्यकुशलता पर भी पड़ता है।
आंदोलन को मिला राजनीतिक और कानूनी समर्थन👇
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के मूल निवास-भू कानून प्रकोष्ठ के अध्यक्ष लुसुन टोडरिया ने आंदोलन को खुला समर्थन देते हुए कहा कि वर्षों से लंबित मांगों की अनदेखी दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई घोषणा पर यदि वर्षों बाद भी निर्णय नहीं हो पाया तो पुलिसकर्मियों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा, “यह संघर्ष अब आर-पार का है। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक मुख्यमंत्री का वादा धरातल पर लागू नहीं हो जाता। 13 जुलाई को पुलिस परिवार, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक एक मंच पर होंगे।”
वहीं अधिवक्ता संदीप चमोली ने भी आंदोलन को कानूनी समर्थन देते हुए कहा कि दो दशक तक कठिन सेवा देने वाले पुलिसकर्मियों को उनका अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने 13 जुलाई के प्रदर्शन में अधिकाधिक लोगों से शामिल होने की अपील की।
13 जुलाई को PHQ घेराव👇
सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम देने के बाद भी समाधान नहीं निकलने पर अब 13 जुलाई को देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय (PHQ) के घेराव का ऐलान किया गया है। आयोजकों का दावा है कि आंदोलन में पुलिस परिवारों के अलावा पूर्व सैनिक, सामाजिक संगठन, राज्य आंदोलनकारी और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
सरकार के सामने चुनौती👇
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुलिस कर्मियों की अपेक्षाओं और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन बनाने की है। यदि समय रहते वार्ता होती है तो समाधान निकल सकता है, अन्यथा यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
चुनावी सवाल भी खड़े👇
आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि यह मामला 2027 के चुनाव के बाद तक टाल दिया जाता है तो इसे चुनावी वादा या “जुमला” कहे जाने की आशंका भी बढ़ेगी। दूसरी ओर सरकार की ओर से इस विषय पर आधिकारिक निर्णय का इंतजार बना हुआ है।
अब निगाहें 13 जुलाई पर👇
अब सभी की नजरें 13 जुलाई को प्रस्तावित PHQ घेराव पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार आंदोलन से पहले कोई पहल करती है या नहीं। यदि संवाद शुरू होता है तो समाधान की संभावना बनेगी, अन्यथा यह मुद्दा आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति और पुलिस व्यवस्था दोनों में बड़ा विषय बना रह सकता है। यदि सरकार या संबंधित विभाग की ओर से कोई नया आधिकारिक निर्णय या स्पष्टीकरण जारी होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।




