चकराता की सियासत में भूचाल! ‘राजपूत, ब्राह्मण और खस नहीं लड़ सकते ST सीट से चुनाव’, फर्जी जनजाति प्रमाणपत्रों पर बड़ा दावा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और सरकारी व्यवस्था में बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने दावा किया है कि चकराता अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित विधानसभा सीट से राजपूत, ब्राह्मण और खस समुदाय के लोग चुनाव नहीं लड़ सकते, क्योंकि ये समुदाय राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल नहीं हैं।
नेगी ने मुख्य सचिव आनंदवर्द्धन को पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि 28 नवंबर 2000 के बाद जारी किए गए बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र नियमों के विपरीत बनाए गए हैं, जिनकी उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है तो सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, आरक्षण और अन्य सरकारी लाभों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है।
नेगी का कहना है कि उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति क्षेत्र नहीं, बल्कि समुदाय आधारित अनुसूचित जनजातियां हैं। उनके अनुसार प्रदेश में मान्य अनुसूचित जनजातियों में थारू, जनसारी (जौनसारी नहीं), भोटिया, बोक्सा और राजी समुदाय शामिल हैं। उनका आरोप है कि वर्षों से संविधान और राष्ट्रपति के आदेशों की गलत व्याख्या कर अपात्र लोगों को एसटी प्रमाणपत्र जारी किए जाते रहे हैं।
उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जनजातियों की सूची में बदलाव, नई जाति जोड़ने या नाम संशोधित करने का अधिकार केवल संसद को है। राज्य सरकार या कोई अधिकारी इसमें परिवर्तन नहीं कर सकता।
नेगी ने स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) और स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) के सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की अधिसूचित सूची से बाहर किसी जाति या उपजाति को अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता।
उन्होंने आरोप लगाया कि विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से गलत आधार पर एसटी प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। यदि इन प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी नौकरी, पदोन्नति, आरक्षण, छात्रवृत्ति, भूमि आवंटन या अन्य लाभ लिए गए हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि ये सभी दावे आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी द्वारा लगाए गए आरोप हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि या किसी सक्षम न्यायिक अथवा सरकारी प्राधिकरण द्वारा सत्यापन होना अभी शेष है।




