आस्था की डोली, पहाड़ की पगडंडी और मां नंदा की विदाई, नम आंखों से उठती है एक ही पुकार—‘मां, फिर जल्दी लौटना’
दुर्गम राहों, पथरीली पगडंडियों और उफनते गदेरों को पार कर आगे बढ़ती है आस्था की डोली
श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ की दुर्गम पगडंडियां, पथरीले रास्ते और उफनते गदेरे कदम-कदम पर परीक्षा लेते हैं, लेकिन जब कंधों पर मां नंदा की डोली हो और जुबां पर मां के जयकारे, तो आस्था के आगे हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है। उत्तराखंड की लोकआस्था और संस्कृति में मां नंदा की डोली की यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पहाड़ की भावनाओं, लोकविश्वास और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप है।
मां नंदा की डोली जब गांव-गांव और पड़ाव-पड़ाव पहुंचती है तो माहौल उत्सव में बदल जाता है। ढोल-दमाऊं की गूंज, पारंपरिक लोकगीत, जागर और पुष्पवर्षा के बीच श्रद्धालु मां का स्वागत करते हैं। दूर-दराज के गांवों से लोग डोली के दर्शन और मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। स्थानीय लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार यात्रियों और श्रद्धालुओं की सेवा-सत्कार में जुट जाते हैं।
लेकिन इस यात्रा का सबसे भावुक क्षण तब आता है, जब मां नंदा की विदाई की बेला होती है। कुछ देर पहले तक जयकारों और उत्साह से गूंज रहा वातावरण अचानक भावुक हो उठता है। आंखें नम हो जाती हैं और मां को बेटी मानकर विदा करते हुए हर मन से एक ही भाव निकलता है—‘मां, फिर जल्दी लौटना।’
उत्तराखंड में मां नंदा को लोकदेवी के साथ-साथ पर्वतीय समाज की बेटी के रूप में भी देखा जाता है। यही कारण है कि नंदा देवी की यात्रा में देवी और भक्त का रिश्ता केवल आराधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह बेटी और मायके के आत्मीय रिश्ते का रूप ले लेता है। डोली के साथ चलने वाले श्रद्धालु केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं निभाते, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों, परंपराओं और लोकविश्वासों को भी आगे बढ़ाते हैं।
गढ़वाल और कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों में मां नंदा की पूजा और उनसे जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है। नंदा देवी की जात यात्रा इसी लोकपरंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें गांव-गांव पड़ाव, सामूहिक सहभागिता, पारंपरिक अनुष्ठान, ढोल-दमाऊं, जागर और लोकगीत उत्तराखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करते हैं।
मां नंदा की डोली के साथ पहाड़ की कठिन राहों पर बढ़ता हर कदम एक आस्था की कहानी कहता है। दुर्गम रास्ते शरीर की परीक्षा जरूर लेते हैं, लेकिन मां के प्रति विश्वास और समर्पण श्रद्धालुओं को निरंतर आगे बढ़ाता है। यही आस्था इस यात्रा को विशेष बनाती है और यही भाव मां की विदाई को इतना मार्मिक कर देता है।
मां की डोली आगे बढ़ती है, जयकारे धीरे-धीरे दूर होते जाते हैं और पीछे रह जाते हैं नम आंखों वाले श्रद्धालु। पहाड़ की हवा में फिर वही पुकार गूंजती है—‘जय मां नंदा… मां, अगले साल फिर जल्दी आना।’




